सफर

सफर ने सफर को सफर की तरहा लिया,
हमने तो उसे मंज़िल समझ लिया।

रास्तों ने भी हमसे कुछ नहीं कहा ,
हमने खामोशियों को ही हम सफ़र बना लिया।

कभी हवा ने नाम लिया उसका,
तो दिल ने फिर वही मोड़ चुन लिया।

अब मंज़िल भी वही, राह भी वही है,
बस वो नहीं — जिसने सफर को सफर बनाया था।

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